Saturday, 10 September 2011

खयालों के रेशमी लिहाफ में

रुई के फाहों सी ये तेरी सरगोशियाँ
हँस पड़ी थी रात जैसे खनकी हो कई चूड़ियाँ
वो हमारी ज़िद थी कोई या थी वक्त की कमज़ोरियाँ
ऐसे रूठे उनसे जैसे बड़े बाप की साहबज़ादियाँ
चान्दनी बरसे न बरसे हमें तो मतलब चाँद से
लुका-छिपी का खेल निराला निराली उसकी कारगुज़ारियाँ


2 comments:

  1. जमाने के बाद देखि है ऐसी रचनाये. बहुत सुन्दर....

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  2. अच्छा है, हमख़यालों की दुनियां में आकर अच्छा लगता है।

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