रात के काले समन्दर में
डूबती-उतरती
नीन्द की सफीना मेरी
दरख्त से बून्द बून्द टपकते
लमहों की आवाज पर
डरती हुई सपनों की गोरैया मेरी
साहिल पे खड़ा घनेरा कोई दरख्त
प्यार से बुलाता हुआ कि
आ जा अपनी शाखों में
थोड़ी पनाह दे दूँ
पर मैं तो आरजुओं की टूटी पतवार लिए
पहुँच जाती हूँ उस चाँद पर
जहाँ आज भी एक बुढिया
चांदी के चरखे पर
बादलों की रूई कातती है
और उसके पार
जहाँ है खुदा का बागीचा
और थपकियाँ देकर सुलाने वाली
कोई नीलम परी
ये क्या कि
हर रात, हर बार
मेरी सफीना
काले समन्दर के
बीच में ही डूब जाती है
हमेशा कोई उकाब
आंखों से सपनो की गोरैया
नोच ले जाता है
और
दूर साहिल पे खड़ा
घनेरा वह दरख्त
अपनी शाखें हिलाता रह जाता है
जागने पर
कुछ नही होता
न वह दरख्त, न वह गोरैया
न वह बुढिया न कोई नीलम परी
साथ रह जाती है
आरजुओं की टूटी
पतवार मेरी
Kali syah raaton me dubte utarate jhak safed komal sapno ki patwar ko haqiqat k bhanvar me uljha hua dekh kar v jis nisprihta se aap khud ko compose karta rakhti hain..use salam kia jana chahiye
ReplyDeleteआपकी उम्र क्या है. उतनी दिखती नहीं जितनी इन कविताओ में दिखती है.
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