कुछ ज़्रर्द सी कुछ सर्द सी शाम का धुन्धला आंचल था
,एक आलम पांव से फिसला था और कतरा भर मौसम छलका था
रात की गलियों कूचों में धडकन नंगे पांव दौड़ी थी
हवाएं कुछ पल ठिठकी थीं, एक तारा शायद टूटा था
न हम उससे बेहतर थे, न वह हमसे कमतर था
एक छन्द और एक ताल पर वक्त का झांझर झनका था
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