Monday, 31 October 2011

कुछ ज़्रर्द सी कुछ सर्द सी शाम का धुन्धला आंचल था
,एक आलम पांव से फिसला था और कतरा भर मौसम छलका था
रात की गलियों कूचों में धडकन नंगे पांव दौड़ी थी
हवाएं कुछ पल ठिठकी थीं, एक तारा शायद टूटा था
न हम उससे बेहतर थे, न वह हमसे कमतर था
एक छन्द और एक ताल पर वक्त का झांझर झनका था

Wednesday, 5 October 2011

अब चाहे रातों के मजहब में
तनहाई लिखी हो
सर्द आहों के अंगारे साथ लिए
घूमती हूँ
पिघलकर समन्दर मे घुल जाओगे
या खाक हो जाओगे
अगर जिस्म औरत का वतन है
तो मान लो
मैं वतनपरस्त नहीं
अलबत्ता
हर रात जिस्म
स्वाहा और स्वधा तक की दूरी
खुदबखुद तय करता है
क्योंकि रूह बेचकर
जिस्म कमाने की
वतनपरस्ती मंज़ूर नहीं
मान लो
औरत का कोई
वतन भी नहीं होता
परस्तों और फरोशों
के बीच सिर्फ
बदन होता है
सतीत्व की तलवार पर
उम्र को साधना
बदनपरस्ती नहीं तो
और क्या है?